मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..
कनेक्शन और करेक्शन का बैलेंस होना चाहिए। बैलेंस रखने वाला ही यथार्थ शिक्षक बन सकता है। यथार्थ शिक्षक के लिए एक तो मर्यादा पूर्वक कनेक्शन हो अर्थात जो भी संकल्प और कर्म करते हैं उसमें हर समय करेक्शन करने के अभ्यासी हो। इनमें दो बाते हैं एक है यथार्थ कनेक्शन और दूसरा है अपने को करेक्शन करने की अटेंशन देना है। यदि दोनो में एक भी बात की कमी है तब सफलता भी अधुरी है। मर्यादा की कनेक्शन करते समय स्वयं सदैव साक्षीपन की स्टेज में हूॅ। इसलिए सदैव यह चैक करें कि हम हर समय अपना करेक्शन करते हैं।
यह केवल बैंलेस बनाने का खेल है। अपने जीवन को श्रेष्ठ और सफल बनाने के लिए बैलेंस रखना होता है। इसके अतिरिक्त जैसी समस्या हो जैसा समय हो उसी प्रकार अपने को शक्तिशाली बनाना है जैसे यदि परिस्थिति सामना करने की है तो सामना करने की शक्ति स्वरूप में हो जाएं और यदि परिस्थिति सहन करने की है तो सहन करने की स्वरूप में स्थित हो जाएं। अर्थात जैसा समय वैसा स्वरूप होने की शक्ति हो।
स्नेह की जगह अगर शक्ति को धारण कर लेते हैं और शक्ति की जगह स्नेह को धारण कर लेते हैं तो इसे धारण शक्ति नही कहेंगे क्योंकि जैसा समय है वेसा स्वरूप धारण करने की शक्ति नही है।
यथार्थ शिक्षक वही है जो स्वयं पहले धारण करता है फिर कुछ कहता है। ऐसा नही है कि खुद कुछ मत करो और केवल दूसरो से कहते रहो। जो दूसरो को डैरेक्शन देते हैं उसे स्वयं में, अपने आप में चैक कर लेना चाहिए।
अव्यक्त बाप दादा मुरली।
महावाक्य

