मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..
अपने विशेष गुण और कर्तव्य को जानते हुए और मानते हुए जो चलते हैं वही नाॅलिजफुल कहलाते हैं।
नाॅलिजफुल का लक्षण होता है कि वह अपनी सेवा से विश्व को सम्पन्न और सुखी बनाता है। जो अपर्याप्त वस्तु है उसको प्रदान करके सर्व आत्माओं को भिखारी से अधिकारी बना देता है। ऐसा व्यक्ति विश्व की सेवा करते हुए सदैव कल्याण और रहम की दृष्टि रखता है। इसलिए ऐसा व्यक्ति सदैव यही लक्ष्य रखता है कि विश्व का परिवर्तन करना ही है। यह लगन दिन रात बनी रहती है।
विश्व सेवा धारी का हर सैकेंड, हर संकल्प, हर बोल और कर्म सेवा में ही लगा रहता है। इसलिए सेवा करने का यह विशेष समय निश्चित नही करते हैं बल्कि हर कदम में अथक सेवा करते रहते हैं। उनके देखने में, चलने में, खाने-पीने में सेवा ही समाई रहती है। इनके मुख्य सेवा का साधन है, इनकी स्मृति, वृत्ति, दृष्टि और कृति। स्मृति द्वारा सभी को समर्थी स्वरूप बना देते हैं और अपने वृत्ति द्वारा वायुमंडल को पावन और शक्तिशाली बना देते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कृति द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने के आधार पर अपने आपकों निमित्त बनाकर हिम्मत दिलाने वाले बन जाते हैं।
ऐसा व्यक्ति स्वयं के दिनरात के आराम को भी त्याग कर सेवा में ही अपना आराम महसूस करता है। इनके समीप आने वाले ऐसा अनुभव करते हैं जैसे शीतलता, शक्ति व शांति के झरने के नीचे बैठे हों। अथवा कोई सहारे तथा किनारे की प्राप्ति का अनुभव करते हैं। इसलिए यह एक विचित्र खान है। जहां पर जिसकों जो चाहिए वह मिल सकता है। ऐसे सेवाधारी तड़पती हुई आत्मा को सहज ही मंजिल का अनुभव कराता है। तथा सदा हर्षित व संतुष्ट रहकर वरदान को स्वतः ही प्राप्त करता है।
सेवा का फल सदैव विजय होता है। सेवा के बाद सफलता स्वतः सिद्ध हो जाती है। सफलता स्वतः अधिकार है। इसी निश्चिय व नशे में रहता है। ऐसे लक्ष्य और लक्षण का अनुभव करते हुए अपने विशेष गुण और कर्तव्य को यर्थात रिति से निभाते हैं। एक तो होता है रिति को निभाना, दूसरा है कर्तव्य को निभाना। ऐसे व्यक्ति सिर्फ कहने वाले नही होते, बल्कि करने वाले भी होते हैं।
साक्षी होकर सर्व आत्माओं का अपना-अपना पार्ट देखते हुए चेक करें कि ऐसा हलचल क्यों होता है। महारथी और घुड़सवार में विशेष अंतर होता है। घुड़सवार क्योश्चन मार्क लेकर चलता है और महारथी की निशानी है फुलस्टाॅप। इनका मेडल लगता नही बल्कि स्वतः लगा होता है। लेकिन, घुड़सवार कब स्टाॅप, कब क्योश्चन में आएगा यह निश्चित नही होता।
परिस्थितियां आएंगी, समस्याएं आएंगी तो न चाहते हुए खुद को छिपा नही सकेंगे। जैसा समय समीप आ रहा है। हम अपना स्वयं ही साक्षात्कार कराएंगे। आॅटोमेटिक्ली समस्या और बातें आएंगी लेकिन हम आगे नही बढ सकेंगे। हमारे पास दीवार को पार करने की शक्ति नही होगी। क्योंकि इसका मूल कारण है हमने शुरू से हमने अपने गुणों और शक्तियों पर फोकस नही किया।
गुणों और शक्तियों पर फोकस करते हुए उसके सहारे चलने वाले अपने अनुभव के फाउंडेशन को मजबूत कर लेते हैं और उलझने से बच जाते हैं।
अगर परमात्मा को साथी बनाएंगे तो माया स्वतः ही अपना साथ छोड़ देगी। क्योंकि जब माया देखेगी कि मुझे छोड़कर किसी और को साथी बना लिया है तो वह किनारा कर लेगी। साथी न होने के कारण अकेले करने पर मेहनत लगती है, परमात्मा से किनारा करते हैं तो छोटी बात भी मुश्किल लगती है। इसलिए स्वयं अपने आप से वचन लें कि कुछ भी हो जाए लेकिन प्रतिज्ञा को कभी नही तोड़ेेंगे। सदैव अटेंशन रहकर खुश रहने का अपने से वचन लेना है। स्वयं व दूसरों की सेवा का बैलेंस हो तब मेहनत कम सफलता अधिक मिलेगी।
अव्यक्त बाप-दादा, महावाक्य मुरली, 21 मई 1977

