हरिद्वार – अखिल विश्व गायत्री परिवार के तत्वावधान में बैरागी द्वीप स्थित शताब्दी समारोह स्थल पर आयोजित आदिवासी सम्मेलन में भारत की विविध जनजातीय संस्कृतियों का जीवंत संगम देखने को मिला। झारखण्ड, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित देश के विभिन्न अंचलों से आए आदिवासी-समष्टि के रक्षक स्वयंसेवकों ने जब अपनी पारंपरिक रंग-बिरंगी वेशभूषा में लोकनृत्य प्रस्तुत किए, तो पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा।
सम्मेलन के मुख्य अतिथि महंत रविन्द्र पुरी महाराज ने कहा कि मूल-संस्कृति, संस्कारों, धर्म संस्कृति व समाज की मान्यताओं एवं परम्पराओं को भूल जाने पर मानव की सभ्यताएं नष्ट हो जाती है। वर्षों से हो रही धर्म परिवर्तन को रोकने में गायत्री परिवार की मेहनत प्रशंसनीय है। श्री महंत ने आदिवासी भाइयों-बहनों को यह संज्ञा देते हुए प्रणाम किया कि आदिवासी लोग किरात रूप में भगवान शिव के गण के रूप में देखता हूं। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार का 80 देशों में सक्रिय मिशन भारतीय मूल के लोगों के परिवारों के बच्चों में संस्कारों को जगाने का कार्य किया जा रहा है।
गुजरात के महिसागर क्षेत्र के जनजातीय नृत्य, छत्तीसगढ़ के बस्तर की सशक्त लोक-परंपराएँ, मध्यप्रदेश के आदिवासी नृत्य रूप तथा झारखण्ड के छोटानागपुर अंचल तथा गढवाली नृत्य की विशिष्ट नृत्य-शैली ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह मन को आह्लादित करने वाला दृश्य उस समय और भी भावविभोर हो गया, जब भारत सहित विश्व के 20 से अधिक देशों से आए गायत्री परिजन भी इस सांस्कृतिक उत्सव में भाव-विभोर होकर झूम उठे। मानो बैरागी द्वीप पर एक “लघु विश्व” सजीव हो उठा हो।
इस अवसर पर शताब्दी समारोह के दलनायक डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति की आत्मा है। उनकी जीवन-शैली प्रकृति, परिश्रम और सामूहिक चेतना पर आधारित है, जो आज के भौतिकतावादी युग में मानवता को नई दिशा दे सकती है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार आदिवासी समाज को केवल संरक्षण नहीं, बल्कि सम्मान, सहभागिता और आत्मगौरव के साथ आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित है। महिला मण्डल की प्रमुख श्रीमती शैफाली पण्ड्या ने कहा कि महिला मण्डल द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में किए जा रहे जागरण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी प्रयासों की भी जानकारी दी।
इस अवसर पर देसंविवि द्वारा प्रकाशित संस्कृति संचार आदि का विमोचन हुआ। उपस्थित स्वयंसेवकों ने सत्संकल्प पाठ किया गया।

