मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..

मिले हुए अनुभव के खजाने को स्वयं में समाकर कार्य में लगाने से अनुभव की अथारिटी बन जाते हैं। योग का सहयोग भी एक प्रकार का खजाना है। जिससे हमें सर्व शक्तियों और सर्व गुणों की प्राप्ति होती है।

स्वयं संतुष्ट रहना और सर्व को संतुष्ट करना, संतुष्टता की इस विशेषता को अपने खजाने में जमा करते चलें। सेवा में संतुष्टता है। क्योंकि यह हमारे खुशी के खजाने का आधार है।

निमित्त भाव, निर्माण भाव और निस्वार्थ भाव रखने से शुभकामना और शुभ भावना स्वतः आ जाती है। इस जमा हुए खजाने को अलग अलग लोग अलग अलग प्रकार से यूज करते हैं। एक तो जमा हुआ खजाना खाया और जमा भी किया। लेकिन खा कर खत्म भी कर दिया।

दूसरे प्रकार के लोग जमा का खजाना खाया, जमा किया और अटेंशन देकर जमा को बढ़ाया भी। जमा के खजाने को बढ़ाने का साधन क्या है? जो खजाना मिला है, समय पर जो परिस्थिति आती है, उस परिस्थिति के अनुसार कार्य में लगाना। जो कार्य में खजाने को लगाते हैं। अर्थात अपनी स्थिति द्वारा परिस्थिति को बदलकर उसे पुनः जमा कर लेते हैं।
जो कार्य में नहीं लगाते, वह जमा नहीं होता, अर्थात अपने गुणों विशेषता को यूज न करने के कारण जमा नहीं होता। जितना ही अपने गुणों विशेषताओं को लगाएंगे उतना ही वह बढ़ता जाएगा। क्योंकि कार्य में लगाने से अनुभव होता है। इससे हमारे अनुभव की अथारिटी बढ़ती जाती है।

अभी चांस बचा है और आगे चांस खत्म हो जाएगा तब चाहकर भी खजाने को बढ़ा नहीं पाएंगे। यदि ज्ञान के खजाने का उदाहरण लें तो दो प्रकार के लोग हैं, एक ज्ञान को सुनने वाले और दूसरे ज्ञान को समाने वाले। क ई लोग ज्ञान को सुनकर बहुत खुश हो जाते हैं। लेकिन ज्ञान को सुनने और समाने में बहुत अंत होता है। समाने वाले अनुभवी होते जाते हैं। सुनने वाले वर्णन तो बहुत करते हैं, बहुत अच्छा सुनाया, बहुत अच्छी बात बोली, लेकिन ज्ञान को समाए बिना यह समय पर काम नहीं देता।

चेक करें यदि हम समाने वालों में थोड़ा भी कम हैं तो भरपूर नहीं होंगे, अंदर हलचल होगी। समाया हुआ व्यक्ति भरपूरता से फुल होगा। इसलिए हलचल नहीं होगी। समाया हुआ व्यक्ति हिलने की मार्जिन ही नहीं देता है। खजाने को बढ़ाना अर्थात अपने को अटेंशन देना। जितना खजाने से भरपूर होंगे उतना अचल अडोल रहेंगे। जितना हमारा भंडार भरपूर होगा, नयनो से, चेहरे और चलनसे ऐसा लगेगा मानो खिला हुआ गुलाब होंगे। ज्ञान और गुण का दान करें। ज्ञान और गुण को सेवा में लगाने से हम सर्व को संतुष्ट कर सकते हैं।

निराश के लिए थोड़ा सा दिल का आनंद, सुख की प्राप्ति करा देता है। कभी भी यदि कोई परिस्थिति आती है तो स्व स्थिति को ऊपर नीचे मत करो। कहते हैं स्व स्थिति के आगे परिस्थिति कुछ भी नहीं करती है। सदा नो प्राब्लम के स्टेज में बने रहें। इससे प्राब्लम सेकेंड में बदल जाएगा। अव्यक्त बाप दादा महावाक्य मुरली 24 मार्च 2009

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