मनोज श्रीवस्तकव जी की कलम से ..

व्यर्थ संकल्प के कारण हम अपना स्वयं जस्टिस नहीं बन सकते है और जजमेंट कराने के लिये हमें बार-बार किसी जज की आवश्यकता पडती है। सारे दिन की दिनचर्या में संकल्प, स्वांस, समय, बोल, कर्म और सम्बंध में सफलता के सितारे का स्वयं अनुभव करना है। हर बात में और हर समय सफलता जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में अनुभव होना है।

मेहनत के बाद, मेहनत कम और सफलता अधिक अनुभव होता है। जितना सोचते हैं, करते हैं, उतना संकल्प और कर्म का प्रत्यक्ष फल भी मिलना चाहिए, लेकिन, उम्मीदों पर चलने वाले कहते है कि यह कार्य हो ही जाएगा, अभी नही तो कभी नही, ऐसे भविष्य फल की उम्मीदों पर चलते रहते हैं। इनके संकल्प में चलता है कि सफलता हुई पडी है, इनके हर कदम में सफलता समाई रहती है। संकल्प व कर्म के बीच में सफलतारूपी वृक्ष समाया है। ऐसे अनुभव होता है जैसे सफलता परक्षाई के समान कर्म के पीछे-पीछे चलती है।

दूसरे हैं लक्की सितारे ये जो भी संकल्प व कर्म करते हैं उनके फल की प्राप्ति मेहनत से ज्यादा होती है। ये अपने लक को मानते हुये ईश्वर का शुक्रिया करते हैं और यह मानते हैं मेरे लक का लाॅक खुल गया है।

तीसरे हैं उम्मीदवार के सितारे ये सदैव श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम को साथ लेकर चलते हैं। हर कदम पर सहारे के आधार पर चलते है। हर संकल्प और कर्म में होगा या नहीं होगा, श्रेष्ठ है या साधारण है, करें या न करें, जजमेंट की शक्ति नहीं होगी। अथार्त यह कभी भी स्वयं जस्टिस नहीं बन सकते है। जजमेंट कराने के लिये इन्हें बार-बार किसी जज की आवश्यकता पडती है।
श्रेष्ठ संकल्प वाले होेते हैं लेकिन दृढ संकल्प वाले नही होते। हर परिस्थिति में उमंग, उल्लास तो होता है, लेकिन हिम्मत नहीं होती है। उनके लिये हिम्मत दिलाने वाला साथी चाहिए। इनके प्लान तो बहुत अच्छे होंगे, संकल्प भी समर्थ होंगे, लेकिन उसको पूरा स्वरूप में नहीं ला सकते, लेकिन इनकी एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि हर समय सहारा लेने का परमात्मा की याद में रहते हैं।

इनके मुख से नशे से और निश्चय से यह बोल निकलता है कि ईश्वर हमारे साथ है, आखिर वह दिन आएगा ही जब हम अपने संकल्प को कर्म में लाकर ही दिखाएंगे। ऐसी उम्मीद हर समय बनी रहती है। दिल शिकस्त नही होते।

ऐसे उम्मीदवार सितारे माया के एक विशेष वार से बचे रहते है। यह विशेष वार है देह अभिमान, ईगो का वार। इसलिए कभी यह देह अभिमान ईगो में नही आते। देह अभिमान, ईगो अथार्त चतुराई या होशियारी का अभिमान अथवा इसे बुद्धि का भी अभिमान कह सकते है। ईश्वर का सहारा लेने के कारण ये ईगो से सेफ रहते है।

ऐसा नहीं कि उनकी बुद्धि में कुछ चलता नहीं, प्लान चलते है, संकल्प भी चलते हैं लेकिन दृढ संकल्प न होने के कारण सहारा लेना पडता है।
अव्यक्त बाप-दादा, महावाक्य मुरली 28 जनवरी 1976

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