मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..

सदा स्वतंत्र रहने पर सर्व प्राप्ति के अधिकारी बन जाते हैं। स्वतंत्र रहने पर हम प्रकृति और माया के अधीन नही रहते हैं। स्वतंत्र रहने का यह डायरेक्शन है कि व्यर्थ संकल्पों को एक सैकेंड में स्टाॅप कर लें और अगले सैकेंड तक इस स्टेज पर स्थित रहें। ऐसे ही एवररेडी स्टेज पर बने रहने का अपने आप से रिहर्सल करना है। जब कोई भी इन्वेंशन अविष्कार विश्व के सामने रखा जाता है तो पहले उसका रिहर्सल किया जाता है।

ऐसे ही इस कार्य का रिहर्सल करें। किसी भी प्रकार की परतंत्रता न हो। सबसे पहली स्वतंत्रता है पुराने बुरी स्मृतियों और ईगो से त्याग की स्वतंत्रता। एक स्वतंत्रता से अन्य सभी स्वतंत्रता सहज आ जाती है। ईगो से परतंत्रता अनेक परतंत्रता का आधार बन जाता है। फलस्वरूप न चाहते हुए भी हम ऐसे बंधन में बंध जाते हैं जो उड़ते पक्षी की आत्मा को पिंजरे की पंक्षी बना देते हैं।

परतंत्रता हमें सदैव नीचे की ओर ले जाती है। परतंत्रता हमारे पतन का कारण बनती है और कभी भी अतिन्द्री सुख के झूले में झूलने का अनुभव नही करने देती है। परतंत्रता हमें बंधनों में बंधी हुई परेशान आत्मा का अनुभव कराती है। इस स्थिति में हम बिना लक्ष्य के बिना कोई रस और निरस स्थिति का अनुभव करते हैं। परतंत्रता की स्थिति में हम सदा स्वयं को अनुभव करेंगे कि हमारे न कोई किनारा है न कोई सहारा है। हम अस्पष्ट रूप में भटकते रहेंगे न गर्मी का अनुभव होगा, न खुशी का अनुभव होगा बल्कि बीच भंवर में ही पड़े रहेंगे। अर्थात हमें कुछ पाना है, अनुभव करना है चाहिए-चाहिए कि मंजिल में सदा अपने को दूर खड़ा हुआ अनुभव करेंगे।

जो अपने आपको स्वतंत्र नही कर सकते हैं वह स्वयं ही अपनी कमजोरियों में गिरते रहने का स्वरूप बन जाते हैं। इसलिए अपने परतंत्रता के बंधनों की सूची सामने रखें और इसे हर रीति से चेक करें। क्योंकि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

जब हम मुक्त आत्मा बन गए हैं, तब पिंजरे में क्यों हैं, बंधन में क्यों और निर्बंधन क्यों नही। इसके उत्तर में हम कहते हैं कि क्या करें माया आ गई, चाहते नही थे लेकिन हो गया। अभी तो थोड़ी बहुत कमिया ंतो रहेंगी ही, हम कर्मातित तो नही है। यह सभी बोल आलस्य और लापरवाही भरे का बोल है। यदि स्वतंत्र नही बनें तो हमें प्राप्त हुआ खजाना और उस खजाने से प्राप्त सुख और आनंद का अनुभव अभी नही कर सकेंगे।

हमें जो पाना है अभी ही पाना है। पा लेंगे नही बल्कि अभी ही पाना है। सारा दिन खुशी में ऐसे खोये रहें कि माया हमें देख तक न सकें और दूर से भाग जाए। जैसे बिजली का करंट लगता है तो मनुष्य नजदीक से दूर जाकर पटक जाता है, वैसे ईश्वरीय शक्ति माया को दूर फेंक देती है। हमारी भीतर ऐसी करंट रहनी चाहिए।

अपने भीतर करंट रखने के लिए कनेक्शन ठीक रखना होगा, अर्थात जिस समय हम परमात्मा के याद में बैठतें हैं तो कनेक्शन जुट जाए और चलते फिरते हमारा कनेक्शन जुटा रहे। प्रातः अमृत बेले रोज अपने कनेक्शन का वरदान लेते रहें तब कमजोर नही बन सकते हैं। हमें वरदान लेने का पात्र बनना है। इसके लिए हमें स्पेशल समय फिक्स करना है जो प्रातः काल का समय है। अव्यक्त-बाप दादा, महावाक्य मुरली, 26 अप्रैल 1977

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