हरिद्वार – धर्म नगरी हरिद्वार में महाकुंभ पर्व का रंग चढ़ गया है। प्रत्येक 12 सालों में एक बार महाकुंभ पर्व का आयोजन होता है। इस पर्व में गंगा स्नान का सबसे खास महत्व माना गया है। हर की पौड़ी पर स्थित ब्रह्मकुंड में स्नान करने का विशेष फलदायी होता है और यही कारण है कि सभी तेरह अखाड़ों के साथ ही तमाम मठ मंदिरों के साधु संत भी इसी ब्रह्मकुंड में गंगा स्नान करते हैं।
भारतीय तिथियों और पंचाग के आधार पर ग्रह नक्षत्रों के विशेष योग के कारण कुम्भ मेले का अयोजन होता है। हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज इन चार स्थानों पर प्रत्येक 12 साल में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने बताते है कि भगवान ब्रह्म जी के कमण्डल से भगवती भागीरथी का उदय हुआ। जब भगवान विष्णु ने राक्षस बली को छलने के लिए विशाल रूप धारण किया तो उनका एक पैर ब्रह्मलोक में चला गया। ब्रह्म जी ने उनके पैर धोकर उस गँगा जल को अपने कमंडल में रख लिया। फिर उसी कमंडल को जब उन्होंने छोड़ा तो वह गँगा जल भगवान शिव की जटाओं में आ गया और भगवान शिव की जटाओं से निकलकर ये जल राजा भगीरथ के रथ के पीछे पीछे गंगासागर तक गया। गँगा सागर में उनके पुत्र भस्म हो गए थे और उनकी आत्मा को मुक्ति नही मिल रही थी। गंगासागर में इसी जल से उनके पुत्रों को मुक्ति प्राप्त हुई। राजा भगीरथ के रथ के पीछे पीछे जो गड्ढा बनता गया उसी का नाम गंगा है।
सागर मंथन के दौरान निकलने वाली अमृत की बूंदें भारत मे चार स्थानों हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में गिरी थी और इन्ही चारो स्थानों पर 12 सालो में एक बार महाकुंभ पर्व का आयोजन होता है।
वहीं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने यह भी बताया कि कुंभ पर्व के दौरान हर की पौड़ी स्थित ब्रह्मकुंड मैं स्नान करने का विशेष फल मिलता है। ब्रह्मकुंड पर जो गंगाजल है उसे ब्रह्मा जी के कमंडल से निकला हुआ गंगाजल माना गया है और यहाँ स्थित गंगा की धारा को नीलधारा कहा जाता है। और यही कारण है कि शाही स्नान के दिन सभी अखाड़ों से जुड़े साधु संत और सभी पीठों के शंकराचार्य इसी धारा में स्नान करते हैं।

