हरिद्वार – धर्मनगरी हरिद्वार महाकुंभ के रंग में सराबोर है। तेरह अखाड़ों के साथ ही सभी मठ मंदिरों की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी है। खास बात ये है कि कुम्भ मेले के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद। साल 1954 में तेरह अखाड़ों से मिलकर अखाड़ा परिषद का गठन हुआ था। इन तेरह अखाड़ो में 7 अखाड़े सन्यासी, तीन बैरागी, दो उदासी और एक निर्मल अखाड़ा शामिल है। देश मे चार स्थानों पर आयोजित होने वाले कुम्भ मेले का स्वरूप अखाड़ा परिषद ही तय करती है।

अखाड़ा परिषद के गठन के पीछे एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है। वर्तमान अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी महाराज बताते है कि तत्कालीन अल्लाहाबाद के कुम्भ में एक बहुत बड़ा हादसा हो गया था। तब 1954 में सरकार की दखलंदाजी के बाद तेरह अखाड़ों को मिलाकर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का गठन किया गया था। तब से लेकर आज तक जहँ कही भी कुम्भ मेले का आयोजन होता है उस मेले का स्वरूप व्यवस्था आदि अखाड़ा परिषद ही तय करती है। देश मे जितने भी मठ मंदिर है उन्हें जोड़ने, देश की एकता बनाये रखने और धार्मिक उन्माद को रोकना ही अखाड़ा परिषद का मुख्य उद्देश्य है।

वही महानिर्वाणी अखाड़े के अध्यक्ष रविंदपुरी महाराज बताते है कि आजादी से पहले कुम्भ मेले की व्यवस्था साधु संतों द्वारा स्वम् की जाती थी। आजादी के बाद 1954 के अल्लाहाबाद कुम्भ में हुए हादसे में कई साधु संत, श्रद्धालुओं के साथ ही हाथी भी गंगा में बह गए थे। उसके बाद व्यवस्था बनाने के लिए ही सरकार के साथ मिलकर अखाड़ा परिषद का गठन किया गया। देश में चार स्थानों पर जहां कहीं भी कुंभ मेले का आयोजन होता है वहां पर कुंभ मेले की सभी व्यवस्थाएं अखाड़ा परिषद और वहां की सरकार मिलकर तय करती है। सरकार से समन्वय बनाने के लिए तेरह अखाड़ो से दो प्रतिनिधि ही सरकार से बातचीत कर सभी व्यवस्था बनाते है।

हरिद्वार महाकुंभ में भी अखाड़ा परिषद से जुड़े साधु संतों ने ही सभी शाही स्नान इत्यादि की सभी व्यवस्था तय की है। पहले शाही स्नान में जूना अखाड़े ने सबसे पहले गँगा स्नान किया था उसके बाद सभी अखाड़ों ने। अब 12, 14 और 27 अप्रैल के शाही स्नान पर निरंजनी अखाड़े के साधु संतों के बाद अन्य सभी 12 अखाड़ों के साधु संत स्नान करेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *