हरिद्वार – धर्मनगरी हरिद्वार कुम्भ मेले के रंग में पूर्ण रूप से रंग गया है। 12, 14 और 27 अप्रैल को कुम्भ मेले के मुख्य शाही स्नान होने है। इस दिन बड़ी संख्या में अखाड़ों से जुड़े साधु संत हर की पौड़ी पर गँगा स्नान करते है। हालांकि शास्त्रों में शाही स्नान का कोई उल्लेख नही है। देश को शाही शब्द भी मुगलों की देन है। इस दिन हर की पौड़ी स्थित ब्रह्मकुंड को सुबह ही खाली करा लिया जाता है, ब्रह्मकुंड में केवल साधु संत ही स्नान करते है।
महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंदपुरी महाराज बताते है कि मगल काल मे जब साधु संत कुम्भ मेले के दौरान शाही अंदाज में गँगा स्नान करने जाते थे। अखाड़ों के साधु संत एक राजा की तरह पूरी शान और शौकत में घोड़े हाथी पर सवार होकर यात्रा निकालते थे इस यात्रा को शाही यात्रा भी कहा जाता है। राजा महाराजा की तरह बड़े-बड़े सिंहासन पर सवार इन साधु संतों के स्नान को शाही स्नान कहा जाने लगा। तब से लेकर आज तक वही प्रथा चली आ रही है। शाही स्नान के दिन अखाड़ों के क्रम भी पहले से ही तय है और सभी तेरह अखाड़े अपने क्रम पर ही गँगा स्नान करते है।
निरंजनी अखाड़े के सचिव रविंदपुरी महाराज का कहना है कि सोमवती अमावस्या के शाही स्नान के पर्व पर कुंभ का पहला शाही स्नान होने जा रहा है। विशेष नक्षत्रों में पड़ रहे इस पर्व का विशेष महत्व है। क्योंकि इस समय कुंभ काल चल रहा है और ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के बाद जिन चार जगह पर अमृत की बूंदें गिरी थी उनमें से एक हरिद्वार भी है जहां हर 12 वर्ष में कुंभ का आयोजन किया जाता है जिसमें भारतवर्ष के विभिन्न साधु संत एकत्र होते है। शाही स्नान को लेकर साधु संतों में खासा उत्साह है।
वही सुबह ही हर की पौड़ी को खाली कराकर साफ सफाई कर दी जाएगी। साधु संत अपने क्रम के अनुसार शाही अंदाज में अखाड़ों से निकलेंगे और शाही जुलूस के साथ हर की पौड़ी पहुंचेंगे। इसके लिए पुलिस प्रशासन ने सभी व्यवस्था कर ली है।

