हरिद्वार – पतंजलि विश्वविद्यालय में शुक्रवार को मानविकी एवं प्राच्य विद्या संकाय अंतर्गत मनोविज्ञान विभाग द्वारा “कंटेम्पररी साइकोलॉजी : इमर्जिंग इश्यूज एंड कंसर्नस ” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह आयोजन बौद्धिक संवाद, चिंतन और विचार-विमर्श का ऐसा अवसर सिद्ध हुआ जिसमें भारतीय और पाश्चात्य मनोविज्ञान की अवधारणाओं के बीच सामंजस्य, टकराव और चुनौतियों को गहनता से समझा गया।

मुख्य वक्ता के रूप में पधारे महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति तथा विश्व स्तर पर विख्यात मनोवैज्ञानिक प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने अपने विस्तृत व्याख्यान में भारतीय चिंतन परंपरा में मनोविज्ञान और पाश्चात्य दृष्टिकोण में मनोविज्ञान का तुलनात्मक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में मनोविज्ञान केवल मानसिक प्रक्रियाओं की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन-दर्शन, आत्म-चिंतन, समरसता और संतुलन की ओर उन्मुख है। इसके विपरीत, पाश्चात्य मनोविज्ञान का झुकाव व्यक्ति-केंद्रितता और व्यवहार की बाह्य अभिव्यक्तियों की ओर अधिक है।
प्रो. मिश्र ने बदलती तकनीकों के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी प्रगतियों ने मानव व्यवहार में नए प्रकार के तनाव, असुरक्षा और अनिश्चितताएँ उत्पन्न कर दी हैं। सोशल मीडिया के दबाव, त्वरित संचार साधनों और उपभोक्तावाद की संस्कृति ने मानवीय संवेदनाओं और सोचने-समझने की क्षमता को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि विचारशीलता और तार्किकता की जगह भावनात्मकता और तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ अधिक प्रभावी होती जा रही हैं।
अपने वक्तव्य में उन्होंने संस्कृत की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया और साथ ही बताया कि स्थानिक मनोविज्ञान और अन्तर-सांस्कृतिक मनोविज्ञान जैसे क्षेत्र मनोविज्ञान को अधिक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की चुनौतियाँ केवल बाहरी नहीं हैं, बल्कि वे व्यक्ति के आंतरिक जगत और सामाजिक संबंधों को भी गहराई से प्रभावित करती हैं।
कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय के प्रति-कुलपति प्रो. मयंक कुमार अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रकार के अकादमिक विमर्श न केवल विद्यार्थियों को अद्यतन ज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं के साथ भी जोड़ते हैं। उन्होंने प्रो. गिरीश्वर मिश्र जैसे विद्वान का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय को बौद्धिक समृद्धि और अकादमिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम की संयोजिका एवं मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. वैशाली गौर ने कहा कि इस व्याख्यान ने विद्यार्थियों और अध्यापकों को समकालीन मनोविज्ञान की जटिलताओं को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। सह-प्राध्यापक डॉ. लोकेश गुप्ता ने भी वक्तव्य देते हुए कहा कि भारतीय मनोविज्ञान और पाश्चात्य मनोविज्ञान के बीच यह संवाद आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
मंच संचालन की जिम्मेदारी अनन्या एवं वृति ने कुशलतापूर्वक निभाई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों एवं विभागों के अध्यक्ष, प्राध्यापकगण, अधिकारी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
यह आयोजन इस तथ्य का सशक्त उदाहरण बना कि पतंजलि विश्वविद्यालय न केवल परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य कर रहा है, बल्कि विद्यार्थियों को गहन बौद्धिक विमर्श के माध्यम से वैश्विक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय जड़ों से जोड़े रखने का भी सतत प्रयास कर रहा है।

