मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..

जो हमेशा देता रहता है उसका हाथ कभी खाली नही रहता है। महादानी बनना अर्थात दूसरों की सेवा करना। दूसरों की सेवा करने से स्वयं की सेवा स्वतः हो जाती है। महादानी बनना अर्थात स्वयं को मालामाल करना। दूसरों को देना ही लेना है। जितनों को हम सुख शक्ति और ज्ञान का दान देते हैं उतनी ही प्राप्ति की आवाज अथवा शुक्रिया जो निकलता है वह हमारे लिए आर्शीवाद बन जाता है। यही आर्शीवाद हमको आगे बढ़ती रहती है। आर्शीवाद मिलने से आपार खुशी होती है।
और संग तोड़ एक संग जोड़ें। जब एक में सर्व सम्बंधों की प्राप्ति हो जाती है तो सहज ही सर्व से किनारा हो जाता है। सर्व से तोड़ना और एक से जोड़ना हमारे लिए सहज हो जाता है। क्योंकि एक द्वारा सर्व प्राप्ति होने से कोई वस्तु अप्राप्त नही रहती है। जिसकी तरफ बुद्धि भटके।

योग युक्त अर्थात युक्त युक्त। जो योग युक्त होगा उसका हर संकल्प समर्थ युक्त होगा। संकल्प रूपी बीज समर्थ होगा तो इसका फल भी समर्थ होगा। आवाज से परे जाना है यह लक्ष्य रखने पर सुनने के बाद समाना हो जाता है अर्थात स्वरूप बनना है। आवाज बंद होगा तभी साइलेंस होगा अर्थात साइलेंस द्वारा ही विजय का नगाड़ा बजेगा। जब तक मुख से नगाड़े ज्यादा बजते है तब तक प्रत्यक्षता नही होती है। जब प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजेगा तब मुख के नगाड़े बनने स्वतः बंद हो जाएंगे। इसे साइंस के उपर साइलेंस की जीत कहते हैं। अभी चाहते हुए भी आदत के अनुसार आवाज में आ जाते हैं। लेकिन, साइलेंस के अभ्यास द्वारा चाहते ही आवाज से परे हो जाते है। जब यह चेंज दिखाई दे तब समझे विजय का नगाड़ा बजने वाला है। इतना जमा करें कि भिखारी आत्माओं को भी महादानी बना सके। इसके लिए सदैव स्टाॅक चेक करें।

ऐसे नही कि हमारे पास समाने की शक्ति तो है किन्तु सहन करने की शक्ति नही है। क्योंकि फाइनल पेपर में क्वेश्चन वहीं से आएगा जहां शक्तियों की कमी होगी। इसलिए कभी ऐसा न सोचना कि छह नही लेकिन दो की धारणा तो है ही। योग नही तो सेवा तो है ही।

इसलिए सदा स्वचिंतन में अपने स्टाॅक को जमा करने में लगे रहें। सदैव अपने हर सब्जेक्ट में आगे बढ़ने के लिए लगे रहें। जितना आगे बढ़ाएंगे उतनी नवीनता का भी अनुभव करेंगे। इसके लिए अंतर्मुखी बनकर अति सूक्ष्म गूढ़ता का अनुभव करें और रिसर्च करें संकल्प धारण करें फिर उसका परिणाम देखें कि जो मैंने सिद्धि देखी अथवा जो मैंने संकल्प किया वह सिद्ध हुआ या नही हुआ। जो शक्ति धारण की है उस शक्ति धारण के प्रैक्टिकल रिजल्ट में कितने परसेंट की कमी है इसके लिए अनुभव की गूढ़ता की प्रयोगशाला में रहने का अभ्यास करें। कर्म और योग के बैलेंस से इसे आगे बढ़ायें। कर्म करते हुए योग की पावरफुल स्टेज में रहें। बैलेंस न होने के कारण चलते-चलते तीव्र गति के बजाए साधारण गति हो जाती है। इन्वेंशन करते हुए विशिष्ट अनुभव के अभ्यास द्वारा नवीनता लाकर एग्जाम्पल बन जाएं।

अव्यक्त बाप-दादा, महावाक्य मुरली 30 जून 1977

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