हरिद्वार – दस दिवसीय संन्यास दीक्षा महोत्सव में आज सातवें दिन जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद महाराज ऋषिग्राम पहुँचे जहाँ स्वामी रामदेव महाराज ने उनका भव्य स्वागत किया। इस अवसर पर स्वामी अवधेशानंद महाराज ने कहा कि सम्यक कामनाओं का न्यास ही संन्यास है। अब हम पतंजलि से वैदिक काल को साकार होते देख रहे हैं, हमारी भारत की पूर्व की अपूर्णता यहाँ चैतन्य है।
उन्होंने कहा कि भगवान् की रचना में मनुष्य की कोटि उत्तम है। मनुष्यों के समूह में भी ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ स्थान व उनसे भी महनीय वानप्रस्थ को लेकिन अत्यंत आदरणीय, सदैव वंदनीय, उत्तम कोटि यदि है तो वह संन्यास है। उन्होंने भावी संन्यासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब आपकी परमहंस दीक्षा होनी है जिसमें आपको अपनी सभी एषणाओं से मुक्त होना है।
इस अवसर पर स्वामी रामदेव महाराज ने कहा कि यह सारा जगत अपरब्रह्म है, इसके परे परब्रह्म है। यह सारा जगत भगवान का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है, और जब उस भगवान की महिमा को देखते हैं तो उससे प्रीति हो जाती है। महर्षि दयानन्द कहते हैं कि भगवान की स्तुति से ही भगवान की प्राप्ति हो जाती है। उन्होंने भावी संन्यासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अपने साधन, साधना और साध्य को सदैव सम्मुख रखते हुए अपने मन्तव्य, गन्तव्य और कर्तव्य का बोध रखते हुए चरैवेति-चरैवेति आगे बढ़ते रहना है। पुरुषार्थ और पराक्रम की पराकष्ठा के साथ अपने पथ पर आगे बढ़ना है।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण महाराज ने भावी संन्यासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि छोटे उद्देश्य के लिए जीना जीवन का अनादर व तिरस्कार है। भगवान के दिए हुए ज्ञान, विद्या, विभूति, ऐश्वर्य, जीवन का सम्मान है। आप जीवन में बड़ा सोचें, अपने आप को गुरु आज्ञा व राष्ट्र सेवा में झोंक दो, सौंप दो स्वयं को प्रभु के हाथों में। बड़े-बड़े रोग छोटे-छोटे उपायों से दूर हो जाएँगे। माता अमृतानंदमयी मठ की संस्थापक अध्यक्ष माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा जी’ ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर भावी संतों को आशीर्वाद दिया। सायंकालीन सत्र में माननीय उच्च शिक्षा मंत्री श्री धनसिंह रावत तथा गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर भारतीय शिक्षा बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष एन.पी. सिंह, महिला मुख्य केन्द्रीय प्रभारी साध्वी देवप्रिया, काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रो. बृजभूषण ओझा, आचार्यकुलम् की निदेशिका बहन ऋतम्भरा शास्त्री, भाई राकेश कुमार ‘भारत’, स्वामी परमार्थदेव, स्वामी विदेहदेव, स्वामी मित्रदेव, स्वामी ईशदेव, स्वामी सोमदेव, साध्वी देवश्रुति, साध्वी देववरण्या, साध्वी देववाणी आदि उपस्थित रहे।

