मनोज श्रीवास्तव जी की कलम से ..
निश्चय का फल है। – ‘विजय।’ कोई भी कार्य करते हैं, अगर कार्य करते हुए स्वयं में, ईश्वर में, ड्रामा में निश्चय है अर्थात सब प्रकार से निश्चय है तो कभी भी विजय न हो ऐसा हो नहीं सकता है। अगर हार होती भी है , तो उसका कारण है – निश्चय में कमी।
अगर स्वयं में भी संशय है जैसे यह कार्य नहीं होगा; सफ़लता होगी या नहीं, तो भी सम्पूर्ण निश्चय नहीं कहेंगे। निश्चय बुद्धि का संकल्प दृढ़ होगा, कमज़ोरी का नहीं होगा। जो होगा वह कर लेंगे, यह भी एक प्रकार से संशय का संकल्प है।
अर्थात जो होगा, नहीं बल्कि यह कार्य हुआ ही पड़ा है – ऐसा निश्चय कर्म करने के पहले भी निश्चय हो कि यह कार्य तो हुआ ही पड़ा है।
हमारी ऐसी स्टेज होनी चाहिये,कैसी भी माया आवे लेकिन हम डगमग न हों। निश्चय बुद्धि वाला व्यक्ति हर तूफान व माया के विघ्न को ऐसे पार करेगा जैसे कुछ है ही नहीं। जैसे साइंस के साधन हैं तो गर्मी होते भी उसके लिए गर्मी नहीं है। ऐसे जिसमे निश्चयबुद्धि होगा उनके आगे माया के तूफान आएंगे लेकिन उसके लिए बड़ी बात नहीं होगी। क्योकि सेफ (Safe;बचाव) रहने के साधन उसके पास हैं ।
हर कार्य में स्वयं निश्चयबुद्धि बनना अर्थात ऐसा निश्चय बुद्धि वाला सदा साक्षी होकर अपना पार्ट भी देखते है और दूसरों का भी देखते है किन्तु, विचलित नहीं होते है। निश्चय बुद्धि वाला व्यक्ति क्या, क्यों जैसे प्रश्नों में नहीं जाता है।
हमारे निश्चय में कमी होने में, आलस्य और लापरवाही मदद करते है। ऐसा जीवन व्यतीत करने वाला स्वयं भी अंदर से संतुष्ट नही होगा और अपने भीतर गुणों – शक्तियों से खालीपन का अनुभव करेगा। लेकिन बाहरी रूप से ईगो अहंकार के कारण अपनी समझदारी को स्पष्ट करता रहेगा। अर्थात उसका हर बोल अंदर से तो खाली होगा लेकिन बाहर से स्वयं को छिपाने का रूप होगा।
जैसे कहा जाता है खाली बर्तन बहुत आवाज करता है और दिखावा करता है उसी तरह अंदर तो धोखा होता है किंतु ऊपर दिखावा होता है। ऐसे व्यक्ति व्यर्थ कर्मो के कारण स्वयं भी असन्तुष्ट और दूसरों के मार्ग में रूकावट का कारण बनेगा। अव्यक्त बाप दादा महावाक्य मुरली 7 जून 1977

