हरिद्वार ब्यूरो रिपोर्ट
हरिद्वार – हरिद्वार में कई प्राइवेट अस्पताल 24 घंटे मरीजों को सेवा देने का बोर्ड लगाए बैठे हैं। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है कि, कई अस्पतालों में डॉक्टर ही नही हैं जो मरीज़ों का इलाज कर सके। जी हैं बिल्कुल सही पढ़ा आपने, शनिवार की रात अचानक राजकीय प्राथमिक शिक्षक एसोसिएशन के ब्लॉक अध्यक्ष अमरीश चौहान के पिताजी अचपल चौहान की तबीयत खराब हो गई, सीने में दर्द की शिकायत के बाद परिजन इलाज़ के लिए उन्हें मेट्रो हॉस्पिटल ले गए, लेकिन अस्पताल ने हाँथ खड़े कर दिए, मरीज़ के परिजन कर्मचारियों से मिन्नत करते रहे, लेकिन डॉ के ना होने की बात कह कर मरीज़ को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, और ना ही किसी तरह का प्राथमिक चिकित्सा दी गई, हॉस्पिटल प्रबंधन ने हार्ट का डॉक्टर ना होने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
मेट्रो हॉस्पिटल के साथ ही परिजनों व उनके साथियों ने 1-2 और अस्पतालों में इलाज़ की जानकारी ली लेकिन वहां भी हार्ट के डॉक्टर के ना होने की बात कही गई। परिजनों ने मरीज को बंगाली हॉस्पिटल ले जाने का निर्णय लिया लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही इलाज़ के अभाव में अचपल चौहान की मौत हो गई। अचपल चौहान की मौत ने हरिद्वार में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरसअल घटना वाले दिन शनिवार को परिजनों ने किस तरह से अचपल चौहान को बचाने की आखरी दम तक कोशिश की जानिए, अमरीश चौहान के पिताजी अचपल चौहान की तबीयत बिगड़ने पर अमरीश चौहान ने अपने साथी शिक्षक व पत्रकार शिवा अग्रवाल से फ़ोन पर मदद मांगी, शिवा अग्रवाल ने इसके लिए प्रयास शुरू कर दिया और इसकी सूचना अपने पत्रकार साथियों को भी दी। शिवा अग्रवाल और उनके पत्रकार साथियों ने अस्पताल प्रबंधन, मुख्य चिकित्सा अधिकारी सहित कई अधिकारियों व डॉक्टरों को फोन घुमाएं, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ एसके झा ने हॉस्पिटल प्रबंधन से बात करके बताया कि वहां पर हार्ट का डॉक्टर ही नहीं है, शहर के नामचीन डॉक्टर से फोन करके हार्ट के डॉक्टर का नंबर लिया गया, लेकिन हार्ट के डॉक्टर साहब का भी फोन स्विच ऑफ आया। हालाकिं तमाम कोशिशों के बावजूद मरीज़ को नहीं बचाया जा सका।
हरिद्वार जैसी जगह में भी हार्ट के मरीजों के लिये किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है, जिले के सरकारी अस्पताल में भी कोई हार्ट का डॉक्टर नहीं है, प्राइवेट हॉस्पिटल दावा जरूर करते हैं, लेकिन जरूरत के वक़्त इसी तरह से अपने हाँथ खड़े कर देते हैं। ऐसे में साफ है दिल के मरीजों के लिए हरिद्वार में कोई सुविधा नहीं हैं।
कोविड जैसी माहमारी के बीच अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी सही समय पर सही इलाज़ नहीं मिल पा रहा है, इलाज़ के अभाव में मरीज़ दम तोड़ रहे हैं, जनपद में 24 घंटे एमरजेंसी सेवा का बोर्ड लगाए बैठे अस्पताल अगर मरीज़ों को ही इलाज़ नहीं दे पा रहे हैं, तो सवाल यही उठता है कि स्वास्थ्य विभाग आखिर ऐसे अस्पतालों पर क्यों मेहरबान हैं, क्यों नहीं ऐसे अस्पतालों के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाती जो दावा तो 24 घंटे एमरजेंसी इलाज़ का करते हैं लेकिन मरीज़ के पहुंचने पर इलाज़ नहीं दे पाते, जिसकी वजह से मरीज़ दम तोड़ रहे हैं। अब देखना है आगे कैसे और किस रूप में स्वास्थ्य विभाग व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर पता है, और ऐसे अस्पतालों पर क्या कार्यवाही होती है।

